बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक तलाक के मामले में फैसला सुनाते हुए अहम टिप्पणियां की हैं। हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि पत्नी को नौकरानी समझना मूर्खता है। HC ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि पत्नी खाना नहीं बना पा रही या घर की सफाई नहीं कर पा रही, इसे 'मानसिक क्रूरता' मानकर तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।

इस दौरान हाईकोर्ट ने बांद्रा फैमिली कोर्ट के 16 साल पुराने उस फैसले को भी पलट दिया, जिसमें पति को तलाक की मंजूरी दे दी गई थी और उसे पत्नी को गुजारा भत्ता ना देने की भी इजाजत दे दो गई थी। हालांकि HC में जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि शादी बराबरी की साझेदारी है, कोई सर्विस कॉन्ट्रैक्ट नहीं।

क्या है पूरा मामला?

इस जोड़े की शादी 2002 में हुई थी। हालांकि 2 साल बाद ही रिश्ते में दरार आ गई। चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) पति ने शादी के महज दो साल बाद तलाक की अर्जी दाखिल की थी। उसका आरोप था कि पत्नी घर का काम नहीं करती, उसके माता-पिता की आज्ञा नहीं मानती, खाना बनाना नहीं जानती, असभ्य व्यवहार करती है और उसे मानसिक तनाव देती है। वहीं पत्नी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसे घर में दासी की तरह रखा जाता था। उससे जबरन कपड़े-बर्तन धुलवाए जाते थे और उसे बचा हुआ बासी खाना खाने पर मजबूर किया जाता था, जिसके कारण तंग आकर उसने ससुराल छोड़ा था।

क्या बोला हाईकोर्ट?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में समाज की रूढ़िवादी सोच की आलोचना करते हुए कई अहम बाते कहीं। हाईकोर्ट ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि एक पत्नी खाना बनाने या साफ-सफाई जैसे घरेलू काम नहीं करती है, उसे अपने आप ही क्रूरता नहीं माना जा सकता। पत्नियां कोई नौकरानी नहीं होती हैं। शादी दो लोगों के बीच बराबरी का एक पवित्र रिश्ता है, कोई नौकरी का कॉन्ट्रैक्ट नहीं है जहां काम न करने पर बर्खास्त कर दिया जाए या तलाक दे दिया जाए।

हाईकोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता की परिभाषा बताते हुए कहा, “शादी के शुरुआती दिनों में तालमेल बिठाने के दौरान होने वाले सामान्य मतभेदों को जरूरत से ज्यादा तूल देकर क्रूरता नहीं माना जा सकता।" अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाक के लिए क्रूरता का मतलब उन मामलों से है जहां साथ रहना एकदम असंभव हो जाए।

पति को देना होगा गुजारा भत्ता

हाईकोर्ट ने पति को गुजारा भत्ता देने का भी आदेश दिया है। इससे पहले फैमिली कोर्ट ने पति को इससे छूट दे दी थी और कहा था कि पत्नी 'आर्ट एंड क्राफ्ट' क्लास का एक विज्ञापन दिया था यानी वह कमा सकती है। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि एक विज्ञापन से यह साबित नहीं होता कि महिला के पास आजीविका का कोई नियमित साधन है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि उसे पत्नी को हर महीने 10,000 रुपए गुजारा भत्ता और रहने के खर्च के लिए 10,000 रुपए अलग से देने होंगे।

पति को देना होगा गुजारा भत्ता

हाईकोर्ट ने पति को गुजारा भत्ता देने का भी आदेश दिया है। इससे पहले फैमिली कोर्ट ने पति को इससे छूट दे दी थी और कहा था कि पत्नी 'आर्ट एंड क्राफ्ट' क्लास का एक विज्ञापन दिया था यानी वह कमा सकती है। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि एक विज्ञापन से यह साबित नहीं होता कि महिला के पास आजीविका का कोई नियमित साधन है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि उसे पत्नी को हर महीने 10,000 रुपए गुजारा भत्ता और रहने के खर्च के लिए 10,000 रुपए अलग से देने होंगे।

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